Category: Mansarovar Part 3

Mansarovar is collection of short stories by Premchand Munshi, the legendary author of hindi literature. The Mansarovar compiled into eight volumes, this is the third volume amongst the collection.


Decree Ke Rypaye by Premchand Munshi

Part 30 of total 30 stories in series Mansarovar Part 3.
  

नईम और कैलास में इतनी शारीरिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक अभिन्नता थी, जितनी दो प्राणियों में हो सकती है। नईम दीर्घकाय विशाल वृक्ष था, कैलास बाग का कोमल पौधा; नईम को क्रिकेट और फुटबाल, सैर और शिकार का व्यसन था, कैलास को पुस्तकावलोकन का;

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Bhade Ka Tatto by Premchand Munshi

Part 29 of total 30 stories in series Mansarovar Part 3.
  

आगरा कालेज के मैदान में संध्या-समय दो युवक हाथ से हाथ मिलाये टहल रहे थे। एक का नाम यशवंत था, दूसरे का रमेश। यशवंत डीलडौल का ऊँचा और बलिष्ठ था। उसके मुख पर संयम और स्वास्थ्य की कांति झलकती थी।

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Aadhaar by Premchand Munshi

Part 28 of total 30 stories in series Mansarovar Part 3.
  

सारे गाँव में मथुरा का-सा गठीला जवान न था। कोई बीस बरस की उमर थी। मसें भीग रही थीं। गउएँ चराता, दूध पीता, कसरत करता, कुश्ती लड़ता था और सारे दिन बाँसुरी बजाता हाट में विचरता था। ब्याह हो गया था, पर अभी कोई बाल-बच्चा न था। घर में कई हल की खेती थी, कई छोटे-बड़े भाई थे।

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Tentar – Mansarovar Part 3 by Premchand Munshi

Part 27 of total 30 stories in series Mansarovar Part 3.
  

आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी; जिसकी चिंता में घर के सभी लोग विशेषतः प्रसूता पड़ी हुई थी। तीन पुत्रों के पश्चात् कन्या का जन्म हुआ। माता सौर में सूख गयी, पिता बाहर आँगन में सूख गये, और पिता की वृद्धा माता सौर द्वार पर सूख गयीं।

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Nirvasan by Premchand Munshi

Part 26 of total 30 stories in series Mansarovar Part 3.
  

परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो!
मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी?
परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और फिर यहाँ किसके साथ आयीं? तब, तब विचार… देखी जायगी।
मर्यादा- क्या इन बातों के पूछने का यही वक्त है; फिर अवसर न मिलेगा?

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Swarg Ki Devi – Mansarovar Part 3

Part 25 of total 30 stories in series Mansarovar Part 3.
  

भाग्य की बात! शादी-विवाह में आदमी का क्या अख्तियार! जिससे ईश्वर ने, या उनके नायबों- ब्राह्मणों ने तय कर दी, उससे हो गयी। बाबू भारतदास ने लीला के लिए सुयोग्य वर खोजने में कोई बात उठा नहीं रखी। लेकिन जैसा घर-वर चाहते थे, वैसा न पा सके।

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