harivanshrai bachchan imageHarivansh Rai Shrivastav alias Bachchan (Hindi: हरिवंश राय बच्चन) (27 November 1907 – 18 January 2003), was a noted Indian poet of Chhayavaadliterary movement (romantic upsurge) of early 20th century Hindi literature.

Born in a Srivastava Kayastha family, in the village of Babupatti (Raniganj) in the district of Pratapgarh ,he was also a famous poet of the Hindi Kavi Sammelan. He is best known for his early work Madhushala (मधुशाला). He is also the father of the noted Hindi film actor, Amitabh Bachchan. In 1976, he was honoured with the Padma Bhushan for his immense contribution to Hindi literature.

  1. Jivan Mein Ek Sitara Tha
    जीवन में एक सितारा था माना बेहद वो प्यारा था यह डूब गया तो डूब गया अम्बर के आनन को देखो कितने इसके तारें टूटे
  2. Jivan Ki Apadhapi Mein
    जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
  3. Hai Andheri Raat Par Diva Jalana Kab Mana Hai
    कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
  4. Kshana Bhar Ko Kyo Pyar Kiya Tha?
    अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर, पलक संपुटों में मदिरा भर, तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था? क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
  5. Tha Tumhein Maine Rulaya!
    हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा! हाय, मेरी कटु अनिच्छा! था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया! था तुम्हें मैंने रुलाया!
  6. Lo Din Bitaa, Lo Raat Gayi
    लो दिन बीता, लो रात गई, सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा, डूबा, संध्या आई, छाई, सौ संध्या-सी वह संध्या थी, क्यों उठते-उठते सोचा था, दिन में होगी कुछ बात नई। लो दिन बीता, लो रात गई।
  7. Mujhe Pukaar Lo
    मुझे पुकार लो इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो! ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता, जहान देखकर मुझे नहीं जबान खोलता,
  8. Sathi Sab Kuch Sahna Hoga!
    मानव पर जगती का शासन, जगती पर संसृति का बंधन, संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा! साथी, सब कुछ सहना होगा!
  9. Kis Kar Mei Yah Bina Dhar Du
    देवों ने था जिसे बनाया, देवों ने था जिसे बजाया, मानव के हाथों में कैसे इसको आज समर्पित कर दूँ? किस कर में यह वीणा धर दूँ?
  10. Madhubala
    मैं मधुबाला मधुशाला की, मैं मधुशाला की मधुबाला! मैं मधु-विक्रेता को प्यारी, मधु के धट मुझपर बलिहारी, प्यालों की मैं सुषमा सारी, मेरा रुख देखा करती है मधु-प्यासे नयनों की माला। मैं मधुशाला की मधुबाला!
  11. Path Ki Pahchan
    पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले। पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की जबानी
  12. Is Par Us Par
    इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा! यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का, लहरालहरा यह शाखाएँ
  13. Kahte Hain Taare Gaate Hain
    कहते हैं तारे गाते हैं! सन्नाटा वसुधा पर छाया, नभ में हमने कान लगाया, फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं! कहते हैं तारे गाते हैं!
  14. Prateeksha
    मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता? मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीण पर बज कर, अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं, कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?
  15. Din Jaldi Jaldi Dhalta Hai!
    हो जाय न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं – यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है! दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
  16. Jugnoo
    अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है? उठी ऐसी घटा नभ में छिपे सब चांद औ’ तारे, उठा तूफान वह नभ में गए बुझ दीप भी सारे, मगर इस रात में भी लौ लगाए कौन बैठा है? अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
  17. Yatra Aur Yatri
    साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! चल रहा है तारकों का दल गगन में गीत गाता चल रहा आकाश भी है शून्य में भ्रमता-भ्रमाता
  18. Madhushala
    मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।
  19. Koshish karne walon ki kabhi haar nahi hoti
    लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
  20. Agneepath
    वृक्ष हों भले खड़े, हों घने, हों बड़े, एक पत्र छाँह भी मांग मत! मांग मत! मांग मत! अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
  21. Andhere Kaa Deepak
    है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है? कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था , भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था, स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा, स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था, ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर ...
  22. Kabi Ko Bashona
    कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा!