हजार स्वर्ण मुद्राए और मुट्टी भर अनाज 

बहुत समय पहले विजयनगर में विद्युलता नाम की एक सुन्दरी रहती थी | वो एक ऐसी विद्वान औरत थी और सभी शैलियों की पांचो कलाओ से पूर्ण थी | एक दिन अपनी योग्यता के गर्व और अहंकार के चलते उसने अपने घर के बाहर एक विज्ञापन लगा दिया कि ” जो भी व्यक्ति उसको प्राचीन ग्रंथों के बुद्धि और ज्ञान में उसको पराजित कर देगा उसको हजार स्वर्ण मुद्राए दी जायेगी “| ये बात नगर के विद्वानों के सम्मान और प्रतिष्टा का मुद्दा हो गया | कई विद्वानों ने विद्युलता को शब्दों के युद्ध में हराने का प्रयास किया लेकिन कोई भी उसे पराजित नही कर पाया |

दिन गुजरते गये एक सुबह एक जलाने की लकड़ी बेचने वाला उसके घर से गुजरा | वो आदमी जोर जोर से चिल्ला रहा था “लकड़ी लेलो , जलाने की लकड़ी लेलो …..मजबूत जलाऊ लकड़ी लेलो…..कौन मेरी मजबूत और लम्बे समय तक जलने वाली जलाऊ लकड़ी लेना चाहेगा ” | उस लकड़ी वाले ने ओर तीखी आवाज में चिल्लाना शुरू किया जो विद्युलता को अब चुभने लगी | वो गुस्से से बाहर निकली और लकड़ी विक्रेता को बुलाया “अरे लकड़ी विक्रेता , इधर आओ ! मै तुम्हारी जलाऊ लकडिया खरीदूंगी , तुम इनकी कीमत बताओ और चिल्लाना बंद करो ” |

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उस लकड़ी विक्रेता ने जवाब दिया “मै इन लकडियो को धन के लिए नही बेचूंगा , अगर तुम मुझे एक मुट्ठी भर अनाज दे दो मै तुम्हे अपनी सारी लकडिया दे दूंगा ” |

लकड़ी विक्रेता ने फिर कहा “मुझे केवल एक मुट्ठी भर अनाज चाहिए , क्या आपने मेरी बात को स्पष्ट रूप से सूना ”

विध्युलता विक्रेता की ओर जोर से चिल्लाते हुए बोली ” क्या तुम मुझे ये पूछ रहे हो कि मुट्ठी भर अनाज का मतलब क्या होता है ?? मै इस नगर की सबसे बुद्धिमान महिला हु ! क्या तुम जानते हो | अब बहस करना बंद करो और इन लकडियो को पीछे आंगन में रख दो ”

वो लकड़ी विक्रेता बार बार कह रहा था ” महोदया , मुझे आप पर दया आती है ! आप ये नही जानती कि मै आपसे क्या मांग रहा हु , अगर आपने मुझे लकडियो की सही कीमत नही दी तो आपको मुझे एक हजार स्वर्ण मुद्राए देनी होगी और अपने घर के बाहर टंगा ये विज्ञापन भी हटाना होगा ”

विद्युलता ने गुस्से में उससे कहा “ये तुम क्या बकवास रहे हो ??”

लकड़ी विक्रेता ने कहा “मै जो कह रहा हु ये कोई बकवास नही है | मैंने आपको कीमत बताई और आप सहमत हो गयी और अगर आपने मेरी कीमत अदा नही की तो मुझे आपको आपकी समझ में फेर के कारण एक हजार स्वर्ण मुद्राए देनी होगी और ये मानना होगा कि मैंने शब्दों के युद्ध में आपको पराजित कर दिया “|

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उन दोनों के बीच काफी गहमा गहमी हो गयी और विध्युलता न्याय के लिए प्रांतीय न्यायालय में चली गयी | उसने न्यायाधीश के समक्ष अपनी बात कही “ये लकड़ी विक्रेता पागल है | इसने मुझसे मुट्ठी भर अनाज के बदले सारी लकडिया लेने को कहा | मैंने उसे ये देने के लिए सहमत हो गयी जो उसने माँगा ” | न्यायादीश ने विक्रेता की ओर देखा और मामले के बारे में पूछा उसने सहजता से उत्तर दिया “श्रीमान , मैंने इनको पहले ही बता दिया था जलाऊ लकड़ी के भार के बदले एक मुट्ठी भर अनाज माँगा था मै वास्तव में अनाज का एक दाना चाहता था जिसमे मेरी मुट्ठी भर जाए , अगर इस बात को ये समझ नही पायी तो इनको अपने घर पर ये विज्ञापन लगाने का अधिकार नही है ”

विद्युलता लकड़ी विक्रेता की बातो से मार खा गयी और फैसला लकड़ी विक्रेता के पक्ष में दिया गया | विद्युलता ने उसे एक हजार स्वर्ण मुद्राए दी और वो विज्ञापन भी हटा दिया | वो बुद्धिमान लकड़ी विक्रेता और कोई नही , तेनालीराम Tenali Raman थे | उसने विद्युलता के घमंड के बारे में सुन रखा था इसलिए उसको सबक सिखाने आया था |

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Thousand Gold Coins and a Handful Grain in Hindi – Tenali Raman Stories in Hindi



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